आईआईटी रुड़की की प्रो. रंजना पठानिया को डीबीटी-वेलकम ट्रस्ट इंडिया एलायंस के सीनियर फेलोशिप से सम्मानित किया गया

रुड़की । आईआईटी रुड़की के जैवविज्ञान और जैवइंजीनियरिंग विभाग की प्रो. रंजना पठानिया को डीबीटी-वेलकम ट्रस्ट इंडिया एलायंस (2020-2021) ने सीनियर फेलोशिप से सम्मानित किया है। डीबीटी-वेलकम ट्रस्ट को जैवप्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी), भारत सरकार और वेलकम ट्रस्ट, इंगलैंड से सहायता प्राप्त है। यह चैरिटेबल संगठन भारत की बुनियादी स्वास्थ्य सेवा की मजबूती के लिए जैविक चिकित्सा, क्लिनिकल और सार्वजनिक स्वास्थ्य शोध के गहन अध्ययन और इनोवेशन में सहायता करता है। इस प्रतिष्ठित फेलोशिप से प्राप्त वित्तीयन से प्रो. पठानिया को एंटीबायटिक रोधी रोगाणुओं के रोग पैदा करने की क्षमता को समझने के लिए आवश्यक अत्याधुनिक शोध में मदद मिलेगी। प्रो. पठानिया के शोध का मुख्य उद्देश्य उस आणविक प्रक्रिया को समझना है जिससे बैक्टीरिया के रोगाणु एंटीबायटिक के खिलाफ प्रतिरोध बना लेते हैं। प्रतिरोध की प्रक्रिया समझने से बैक्टीरिया रोधी नए यौगिकों की खोज की असरदार रणनीति बनाने में मदद मिलेगी। बैक्टीरिया में प्रतिरोध क्षमता का विकास होना एक बड़ी चुनौती है जो वर्षों से एंटीबायटिक दवा की खोज में देखी गई है जबकि गहन शोध और भारी वित्तीय निवेश जारी है। इससे नई एंटीबायटिक दवाएं बेअसर हो जाती हंै। इसलिए प्रो. पठानिया ने अपने शोध से जिद्दी बैक्टीरिया रोगाणु – एसीनेटोबैक्टरबौमनी में एंटीबायटिक को बेअसर करने और रोग पैदा करने की प्रक्रिया की गुत्थी सुलझाने की कोशिश की है। यह प्रक्रिया स्पष्ट होने के बाद इस जानकारी का लाभ लेकर बेहतर एंटीबायटिक दवाओं की खोज सफल होगी जो लंबे समय तक असरदार रहेंगी।
प्रो. पठानिया ने अपने शोध के बारे में बताया, “ए. बौमनी अस्पताल में होने वाले संक्रमण के प्रमुख कारणों में एक है। इसकी वजह से पूरी दुनिया में निमोनिया, मेनिन्जाइटिस, बैक्टेरिमिया, मूत्रमार्ग और घाव आदि के संक्रमण होते हैं। ए. बौमनी पर वे एंटीबायटिक दवाएं भी बेअसर हैं जो अंतिम हथियार के रूप में दी जाती हैं। इसलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने ए. बौमनी को अत्यधिक गंभीर रोगजनक के रूप में वर्गीकृत किया है। ऐसे रोगजनकों पर असरदार नए एंटीबायटिक तैयार करना अनिवार्य है। नए उपचार विकसित करने के लिए यह जरूरी है कि हम इसके रोगजनक बनने की सफलता की शारीरिक प्रक्रियाओं को समझें और यह भी समझें कि यह होस्ट की प्रतिक्रिया पर कैसे काबू पाता है। इस वित्तीयन की मदद से हम इन माध्यमों को समझेंगे और भविष्य में दवा की खोज करने में इनका लाभ लेंगे। आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रोफेसर अजीत के. चतुर्वेदी ने कहा, ‘‘प्रो पठानिया को डीबीटी वेलकम ट्रस्ट इंडिया एलायंस का सीनियर फेलोशिप मिलने की मुझे बहुत खुशी है। इसमें बहुत प्रतिस्पर्धा है और प्रतिष्ठा भी बहुत है। यह इसका प्रमाण है कि प्रो पठानिया के शोध के लक्ष्यों का वैज्ञानिक आधार मजबूत है। फेलोशिप से प्राप्त पर्याप्त वित्तीय सहायता से वे हमारी इस गंभीर समस्या को अधिक गहराई से सुलझाने में सक्षम होंगी।’’
प्रो. पठानिया के अब तक के शोध से विभिन्न दवाओं को बेअसर करने वाले रोगाणुओं के रूप में ए. बौमनी की सफलता में राइबो-नियंत्रण और अन्य आणविक प्रक्रियाओं की भूमिका स्पष्ट हो गई है। इस फेलोशिप की मदद से वे ए बौमनी की शारीरिक संरचना और रोगजीवविज्ञान में छोटे आरएनए की भूमिका समझने में सक्षम होंगी। वे कुल मिलाकर ऐसी तीन प्रक्रियाओं पर शोध करेंगी जो इन रोगाणुओं के पोषक तत्व प्राप्त करने और उपयोग करने में केंद्रीय भूमिका निभाती हैं। ये रोगाणुओं के ‘सबसे कमजोर पहलू’ हो सकती हैं और निकट भविष्य में चिकित्सकीय रणनीति बनाने में मदद कर सकती हैं।

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