इस बार भी जातिवाद के खिलाफ रहा माहौल, कोई नहीं चाहता नगर निगम की सियासत में फिर से हो जातिवाद राजनीति हावी

रुड़की । नगर निगम क्षेत्र का मतदाता नहीं चाहता है कि यहां की सियासत में फिर से किसी जातिवाद का बोलबाला हो। माना जा रहे इसीलिए मतदाताओं ने इस बात को ध्यान में रखते हुए ही अपने मत का उपयोग किया है। दरअसल, पहले त्रिलोकीनाथ और इसके बाद इंजीनियर राजेश गर्ग जब नगरपालिका के चेयरमैन रहे तो जातिवाद हावी होने की बात सामने आई। जिसके चलते अन्य बिरादरी के लोग वैश्य समाज की सियासतकारों के खिलाफ लामबंद हो गए। इसका नतीजा यह रहा कि वर्ष 2003 में गैर वैश्य बिरादरी के मतदाताओं ने इंजीनियर राजेश गर्ग की जमानत जप्त करा । उनकी जगह दिनेश कौशिक को नगरपालिका का चेयरमैन बना दिया। इसी चुनाव में प्रमोद गोयल को भी पूर्व की जातिवाद की राजनीति का ही नुकसान हुआ था। हालांकि उससे इनका कोई लेना-देना नहीं था । लेकिन शहर के मतदाता वैश्य समाज के सियासतकारों से नाराज थे। जिस पर उन्होंने इंजीनियर राजेश गर्ग के साथ ही प्रमोद गोयल को भी निशाने पर ले लिया था। यह आक्रोश की राजनीति यहीं नहीं थमी और जैसे ही वर्ष 2008 का चुनाव हुआ तो इसमें भी गैर वैश्य मतदाताओं ने इंजीनियर राजेश गर्ग को तीसरे नंबर से आगे नहीं बढ़ने दिया। दिनेश कौशिक को भी इस चुनाव में बड़ी डिफीट मिली। जीत का सेहरा प्रदीप बत्रा के सिर बंधा। वर्ष 2013 में कांग्रेस के सिंबल पर वैश्य समाज के नए चेहरे राम अग्रवाल चुनाव मैदान में आए ।लेकिन उन्हें भी उसी आक्रोश का सामना करना पड़ा जो कि पिछले एक दशक से चला रहा था। क्योंकि राम अग्रवाल के चुनाव में भी वैश्य समाज के वही नेता सक्रिय बने ह थे जो कि अन्य समाज के मतदाताओं के नजरों में पहले से चढ़े हुए थे। अब जो चुनाव हुआ है। इसमें भी गैर वैश्य समाज के मतदाताओं ने जातिवाद के खिलाफ ही मतदान किया। यानी कि इस चुनाव में भी वैश्य समाज के सियासतकारों प्रति आक्रोश ज्यों का त्यों रहा। अब सवाल उठता है कि जब गैर वैश्य मतदाताओं का वैश्य समाज की सियासतकारों के प्रति गुस्सा बरकरार था तो फिर वैश्य समाज के ही गौरव गोयल कैसे जीत गए। यहां पर जो गैर वैश्य समाज के मतदाताओं की ओपिनियन यह है उन्होंने गौरव गोयल को वैश्य समाज का बड़ा चेहरा नहीं माना । ना ही उन्हें इस समाज का बड़ा सियासतकार । इसीलिए सभी ने उन्हें वोट दे दी । उनका कहना है कि इस चुनाव में वैश्य समाज का प्रत्याशी मयंक गुप्ता को माना गया है। वह वैश्य समाज के बड़े नेताओं में शुमार है भी। दूसरे उनके साथ वही वैश्य समाज के वही सियासतकार देखे गए जिन्हें अन्य बिरादरी के लोग वैश्य समाज के बड़े नेताओं में से एक मानते हैं । समय-समय पर वह वैश्य समाज के लिए लामबंदी करते भी हैं। इस चुनाव में भी उन्होंने वैश्य समाज की न जाने कितनी बैठकें की। सम्मेलन किया। चुनाव में समर्थन का ऐलान किया। जिसकी प्रतिक्रिया स्वरूप अन्य बिरादरी के लोग भाजपा के प्रत्याशी मयंक गुप्ता से छिटक गए और उन्होंने गौरव गोयल को वैश्य समाज का नेता न मानकर सामान्य कार्यकर्ता मानते हुए उन्हें समर्थन कर दिया। जिसके परिणाम स्वरुप वह विजय हासिल करने में कामयाब रहे। राजनीतिक जानकार मान रहे हैं कि जैसे ही चुनाव का डंका बजा था तो तभी शहरी सियासत में सुगबुगाहट शुरू हो गई थी कि वैश्य समाज के सियासतकारों खिलाफ मतदान होना चाहिए । अन्य बिरादरी के मतदाता नगर निगम की सियासत में वैश्य समाज की सियासतकारों का उतना बेतुका दखल नहीं चाहते। जितना कि कभी रहा है। अन्य बिरादरी के लोग चाहते हैं कि नगर निगम बोर्ड में ऐसे व्यक्ति को ही जिम्मेदारी मिलती रहे जो कि जातिवाद की राजनीति ना करके सभी को साथ लेकर चलने की सोच रखता हो। वर्ष 2003 में दिनेश कौशिक को इसी के तहत जिम्मेदारी मिली थी ।वर्ष 2008 में प्रदीप बत्रा को भी इसी कारण जीत हासिल हुई थी और वर्ष 2013 में यशपाल राणा को भी इसी वजह से कामयाबी मिली थी। राजनीति के जानकार यह भी कह रहे हो कि निर्दलीय गौरव गोयल के चुनाव का संचालन वैश्य बिरादरी के सियासतकार नहीं कर रहे थे। इसका उन्हें लाभ मिला। जबकि मयंक गुप्ता के चुनाव का संचालन वैश्य बिरादरी की सियासतकार कर रहे थे। इसका उन्हें भारी नुकसान हुआ। इसी प्रतिक्रिया में कई बिरादरी के वोट भाजपा जैसी पार्टी के सिंबल तक से छिटक गए। जातिवाद के खिलाफ खिलाफ चल रहा आक्रोश अभी बहुत दिन तक चुनाव परिणामों को इसी तरह से प्रभावित करता रहेगा।

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