भारत में बाढ़ और सूखे के प्रति संवेदनशीलता तेजी से एक-दूसरे से जुड़ रही है: आईआईटी रुड़की के अध्ययन में खुलासा
रुड़की। भारत में बाढ़ और सूखे, दो विपरीत दिखाई देने वाली चरम स्थितियों के प्रति जिलों की संवेदनशीलता में बढ़ता हुआ अतिव्यापन देखने को मिल रहा है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किए गए एक अध्ययन में पाया गया है कि देश के कई हिस्सों में दोनों आपदाओं के प्रति संवेदनशीलता बढ़ी है, साथ ही ऐसे जिलों की संख्या में भी वृद्धि हुई है जो अनेक और एक-दूसरे से जुड़ी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
npj Natural Hazards, जो नेचर पोर्टफोलियो की एक शोध पत्रिका है, में प्रकाशित इस अध्ययन में जिला स्तर पर उपलब्ध नवीनतम राष्ट्रीय स्तर पर तुलनीय और विस्तृत सामाजिक-आर्थिक, जनसांख्यिकीय तथा बुनियादी ढाँचे संबंधी आँकड़ों के आधार पर वर्ष 2001 और 2011 के लिए भारत के 591 जिलों का विश्लेषण किया गया। बाढ़ और सूखे का अलग-अलग अध्ययन करने के बजाय, इस शोध में दोनों को बहु-आपदा संवेदनशीलता सूचकांक (Multi-Hazard Vulnerability Index—MHVI) के माध्यम से एक साथ विश्लेषित किया गया, ताकि उन क्षेत्रों की पहचान की जा सके जहाँ दोनों चरम स्थितियों के प्रति अंतर्निहित सामाजिक, जनसांख्यिकीय और भौतिक संवेदनशीलताएँ एक-दूसरे से जुड़ रही हैं।
निष्कर्ष भारत में संवेदनशीलता के परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाते हैं, जहाँ बड़ी संख्या में जिले जल विज्ञान संबंधी चरम घटनाओं के प्रति अधिक संवेदनशील पाए गए हैं। वर्ष 2011 तक, देश के पाँचवें हिस्से से अधिक जिले बाढ़ के प्रति अत्यधिक संवेदनशील श्रेणी में थे, जबकि लगभग पाँचवाँ हिस्सा सूखे के प्रति उच्च संवेदनशीलता दर्शाता था। संयुक्त आकलन से बहु-आपदा संवेदनशीलता की बढ़ती प्रमुखता भी सामने आई, जिसमें प्रत्येक दस में से एक से अधिक जिले बहु-आपदा संवेदनशीलता सूचकांक (MHVI) के उच्च स्तर की ओर स्थित पाए गए।
शोध से पता चलता है कि ये परिवर्तन पूरे देश में समान रूप से वितरित नहीं हैं। बहु-आपदा हॉटस्पॉट का बढ़ता संकेंद्रण विशेष रूप से पूर्वी और उत्तरी भारत में देखा गया। ओडिशा, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, बिहार और झारखंड सहित कई राज्यों के विभिन्न जिलों में बाढ़ और सूखे, दोनों के प्रति संवेदनशीलता में वृद्धि दर्ज की गई। उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल दोनों आपदाओं के प्रति उच्च संवेदनशीलता वाले क्षेत्रों में प्रमुखता से शामिल रहे।
महत्वपूर्ण रूप से, यह अध्ययन दर्शाता है कि केवल राज्य स्तर पर संवेदनशीलता का आकलन करने से अलग-अलग जिलों के बीच मौजूद महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट नहीं हो पाते। जिला-स्तरीय आकलन प्रस्तुत करके यह फ्रेमवर्क उन क्षेत्रों की अधिक विस्तृत समझ प्रदान करता है जहाँ समुदाय अनेक प्रकार के दबावों का सामना कर सकते हैं और जहाँ जलवायु अनुकूलन तथा आपदा जोखिम न्यूनीकरण के प्रयासों पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता हो सकती है।
अध्ययन का नेतृत्व करने वाले प्रो. मोहित प्रकाश मोहंती ने कहा, “बाढ़ और सूखे को अक्सर अलग-अलग जोखिमों के रूप में देखा जाता है, लेकिन इनके परिणाम एक ही सामाजिक और भौतिक प्रणालियों के भीतर रहने वाले समुदायों को प्रभावित करते हैं। हमारा विश्लेषण दर्शाता है कि इन चरम स्थितियों के प्रति संवेदनशीलता बदल रही है और कई क्षेत्रों में दोनों के बीच अतिव्यापन बढ़ रहा है। इन प्रतिरूपों की जिला-स्तरीय समझ तैयारियों और अनुकूलन के लिए एकीकृत दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता वाले क्षेत्रों की पहचान करने में मदद कर सकती है।”
ये निष्कर्ष विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि जलवायु परिवर्तनशीलता और जल विज्ञान संबंधी चरम घटनाएँ बुनियादी ढाँचे, आजीविका, जल संसाधनों और स्थानीय विकास प्रणालियों के लिए लगातार बड़ी चुनौती बन रही हैं। आपदाओं की घटना के साथ-साथ संवेदनशीलता को समझने से आपदा जोखिम नियोजन को केवल एक आपदा पर केंद्रित दृष्टिकोण से आगे बढ़ाकर ऐसी रणनीतियाँ विकसित करने में मदद मिल सकती है, जो अनेक और संभावित रूप से एक-दूसरे को प्रभावित करने वाले जोखिमों को ध्यान में रखें।
इस अध्ययन को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) ने आईआईटी रुड़की स्थित जलवायु परिवर्तन अनुकूलन, आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं सततता के लिए एकीकृत केंद्र (ICARS) के माध्यम से समर्थन प्रदान किया। यह परियोजना संख्या DST-2211-WRC/23-24 के अंतर्गत, DST/CCP/NMSKCC/CoE/236/2024(G) के तहत स्वीकृत की गई थी। अध्ययन के लिए कम्प्यूटेशनल संसाधन आईआईटी रुड़की के जल संसाधन विकास एवं प्रबंधन विभाग द्वारा उपलब्ध कराए गए।
यह शोध बहु-आपदा संवेदनशीलता के स्थानिक प्रतिरूपों की पहचान के लिए आधार प्रदान करता है और जोखिम-आधारित अनुकूलन नियोजन, संसाधनों की प्राथमिकता तय करने तथा जलवायु-लचीले आपदा जोखिम न्यूनीकरण के प्रयासों में सहायता कर सकता है। शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि बहु-आपदा संवेदनशीलता सूचकांक अंतर्निहित संवेदनशीलता की स्थितियों के सापेक्ष वितरण और उनमें समय के साथ होने वाले बदलाव को दर्शाता है। इसका उद्देश्य आपदाओं से होने वाले नुकसान या प्रभावों की निश्चित भविष्यवाणी करना नहीं है।


