कोरोना काल में बदल गई भाषा, कोरोना के प्रभाव को लेकर आयोजित राष्ट्रीय वेबिनार में जुड़े देश भर से शिक्षाविद, जनसंचार विशेषज्ञ, बोले भाषा और मीडिया पर पड़ा कोरोना का व्यापक प्रभाव

हरिद्वार । कोरोना काल में समाज में जहां अन्य परिवर्तन आए हैं वही भाषा भी बदली है। भाषा में नए शब्दों का प्रचलन बढ़ा है और हिंदी भाषा में अंग्रेजी के कई नए शब्दों को अंगीकृत किया है l भाषा, जनसंचार और समाज पर कोरोना के प्रभाव को लेकर आयोजित राष्ट्रीय वेबिनार में देश भर से जुड़े शिक्षाविदों और जनसंचार विशेषज्ञों ने कहा कि भाषा और मीडिया, दोनों पर कोरोना का व्यापक प्रभाव पड़ा है। चमनलाल स्नातकोत्तर महाविद्यालय के अंग्रेजी विभाग द्वारा आयोजित इस वेबिनार के आरम्भ में आयोजन सचिव डॉ दीपा अग्रवाल ने प्रतिभागियों का स्वागत किया और वक्ताओं का परिचय कराया। प्रबन्ध समिति अध्यक्ष रामकुमार शर्मा, सचिव अरुण हरित और कोषाध्यक्ष अतुल हरित ने आयोजन टीम को बधाई दी। मुख्य वक्ता के तौर पर गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और कनेडियन अध्ययन केंद्र के निदेशक डॉ श्रवण कुमार शर्मा ने कहा कि कोरोना प्रसार के इस दौर में इंसान को सभी रास्ते बंद नजर आ रहे हैं, लेकिन सभी को विश्वास रखना होगा कि मानवता को जल्द ही नया रास्ता नजर आएगा। उन्होंने कहा कि संहार में ही सृजन छुपा है। कोरोना केवल इतना याद याद दिला रहा है कि एक नया रास्ता अंडर प्रोसेस है। उन्होंने कहा कि इस समय लिटरेचर, लैंग्वेज और मीडिया और गहनता से आपस में जुड़ गए हैं। वरिष्ठ पत्रकार निशीथ जोशी ने कहा कि कोरोना के संक्रमण काल में सोशल मीडिया महत्वपूर्ण रोल अदा कर रहा है। इस दौर में नए-नए शब्द निकल कर आ रहे हैं, जो आमजन की भाषा में घुल मिल गए हैं। उन्होंने कहा कि कोरोना काल के चलते भारतीय मूल्यों और भारतीयता का दौर पुनः वापस आ रहा है। उन्होंने कहा कि कोरोना से पहले जनता-कर्फ्यू और लॉकडाउन शब्दों को कोई नहीं जानता था, लेकिन अब ये आम प्रचलित शब्द बन गये है। उत्तराखंड राजभवन के सूचना उपनिदेशक डॉ नितिन उपाध्याय ने कहा कि कोरोना संक्रमण सबसे बुरा प्रभाव प्रिंट मीडिया पर पड़ा है, मौजूदा हालात चुनौती भरे हैं, लेकिन प्रिंट मीडिया दोबारा अपने पुराने स्वरूप में लौटेगा। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में ऑनलाइन रीडिंग हैबिट बढ़ेगी। ग्राफिक एरा हिल यूनिवर्सिटी की सहायक प्रोफेसर डॉ शिखा शुक्ला ने कहा कि कोरोना के फैलाव के चलते मानसिक तौर पर लोग प्रभावित हुए हैं। बीते कुछ महीने से आम लोग सोशल मीडिया पर ज्यादा समय बिता रहे हैं। जिसका प्रभाव सीधे तौर पर मन, मस्तिष्क पर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि यह सूचना का महाकाल है, जिसमें बहुत सारी सूचनाएं आ रही हैं, इनमे से पॉजिटिव सूचनाओं को ग्रहण करने की जरूरत है। दिल्ली की वरिष्ठ पत्रकार पारुल शर्मा बुधकर ने कहा कि मौजूदा दौर में सोशल मीडिया पर नेगेटिव न्यूज़ बहुत ज्यादा शेयर की गई है। इस वक्त सबसे खतरनाक बात यह है कि सूचनाएं वेरीफाइड नहीं है। न्यूज़ चैनलों ने कोरोना को लेकर लोगों के भीतर डर पैदा किया है। जिसके कारण लोगों में चिंता और परेशानी बढ़ी है। वरिष्ठ पत्रकार प्रभात ओझा ने कहा कि वेबीनारों का आयोजन समय के अनुकूल है। इस दौर में न केवल मीडिया की भाषा में, बल्कि आम लोगों की भाषा में भी कई स्तरों पर बदलाव आया है और आने वाले समय में भी यह प्रक्रिया गतिमान रहेगी। चमनलाल महाविद्यालय के प्राचार्य एवं भाषा विज्ञानी प्रोफेसर सुशील उपाध्याय ने कहा कि कोरोना काल में हिंदी ने अंग्रेजी पारिभाषिक शब्दों को ज्यों का त्यों अंगीकृत कर लिया है। आइसोलेशन और लॉकडाउन जैसे शब्दों का हिंदी अर्थ लिखने के बजाय इन्हें मूल रूप में प्रयोग में लाया जा रहा है। उन्होंने हर एक शब्द का अनुवाद करके उसे इस्तेमाल किए जाने की प्रवृत्ति को अच्छा नहीं बताया। वेबीनार की समन्वयक डॉक्टर सरोज शर्मा ने वेबीनार के निष्कर्ष प्रस्तुत किए। सह-समन्वयक डॉ अपर्णा शर्मा ने आभार जताया। वेबीनार में 10 राज्यों के सौ से अधिक प्रोफेसरों, शिक्षाविदों, पत्रकारों और शोधार्थियों ने प्रतिभाग किया। वेबीनार का संचालन डॉक्टर दीपा अग्रवाल ने किया।

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