रुड़की और हरिद्वार में भाजपा को आत्म चिंतन की जरूरत, 2 गुना से अधिक वोट होने के बाद भी कांग्रेस से हार गई भाजपा
रुड़की । हरिद्वार और रुड़की में भाजपा को आत्म चिंतन की जरूरत है। दरअसल, दोनों शहर में दोगुना से अधिक वोट होने के बाद भी भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस से हार गई है। पिछले वर्ष हरिद्वार नगर निगम के चुनाव में भाजपा प्रत्याशी कांग्रेस से हारी और अब रुड़की में भाजपा के प्रत्याशी कांग्रेस के प्रत्याशी से हार गए। वह भी काफी अधिक वोटों से। जबकि दोनों ही शहर में भाजपा के कांग्रेस से दोगुना से अधिक वोट है। इस बात की पुष्टि वर्ष वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भी हो चुकी है और वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव परिणाम में भी। चिंताजनक बात यह है कि हरिद्वार में शहरी विकास मंत्री मदन कौशिक जैसे दिग्गज के होते हुए भाजपा हारी है। जबकि रुड़की में भाजपा के चार में से तीन विधायक होने के बावजूद भी भाजपा प्रत्याशी तीसरे नंबर पर रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि जब हरिद्वार नगर निगम में भाजपा हारी तो तब भी हरिद्वार लोकसभा क्षेत्र के सांसद डॉ रमेश पोखरियाल निशंक ही थे और अब रुड़की में भाजपा तीसरे नंबर पर पहुंची है तो सांसद डॉ निशंक ही हैं। अभी है कह देना कि हरिद्वार में मेयर प्रत्याशी शहरी विकास मंत्री मदन कौशिक की समर्थक थी और रुड़की में मेयर प्रत्याशी मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के समर्थक । यह सब निष्ठावान कार्यकतार्ओं के गले नहीं उतर रहा है। उनका कहना है कि उनके स्तर से मेहनत में कहीं कोई कमी नहीं रही । यदि कोई कमी और खामी रही है तो वह पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के स्तर से हुई है । चुनावी रणनीति बनाने में चूक रही है। हां यह बात अपनी जगह है कि नगर निगम के चुनावों को लोकसभा व विधानसभा के चुनाव से जोड़कर नहीं देखा जा सकता क्योंकि विधानसभा के चुनाव में राज्य स्तरीय मुद्दे हावी रहते हैं तो लोकसभा का चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों से प्रभावित होता है। लेकिन ऐसा भी कहीं नहीं देखा कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव में एकतरफा जीत हासिल करने वाली पार्टी नगर निगम के चुनाव में दूसरे तीसरे नंबर पर पहुंच जाएं। राजनीतिक जानकारों की मानें तो हरिद्वार में शहरी विकास मंत्री मदन कौशिक के रुतबे के कारण ही भाजपा का कोई विद्रोही प्रत्याशी मैदान में नहीं उतारा था। अन्यथा वहां पर भी भाजपा तीसरे नंबर पर ही रहती। रुड़की में किसी भाजपा के दिग्गज नेता का शहरी विकास मंत्री जैसा रुतबा नहीं है ।इसलिए यहां पर गौरव गोयल विद्रोही प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरे और उन्होंने जीत हासिल की व भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी को तीसरे नंबर पर पहुंचा दिया। हां यह बात अपनी जगह है कि नगर निगम के चुनाव में खुद प्रत्याशी की ताकत भी मायने रखती है। यदि प्रत्याशी संसाधन और जनाधार वाला है तो निश्चित रूप से वह लड़खड़ाते चुनाव को भी संभाल लेता है। यदि प्रत्याशी खुद में कमजोर हो तो वह जीते हुए चुनाव को भी संभाल नहीं पाता। हरिद्वार रुड़की में कुछ ऐसा ही हुआ है दोनों जगह प्रत्याशी अपने स्तर से चुनाव को मजबूती नहीं दे सके। इसीलिए पार्टी रणनीतिकारों को आत्मचिंतन की जरूरत है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि चाहे कमी चुनावी रणनीति बनाने में रही हो या फिर प्रत्याशी चयन में । पर हार तो हुई ही। इसीलिए भाजपा को दोनों शहरों में वाकई ही आत्म चिंतन करना चाहिए। अन्यथा दोनों शहरों में पार्टी को आगे चलकर और नुकसान हो सकता है। मतलब के दोनों शहरों में यदि भाजपा प्रत्याशी खुद में दमदार होंगे तो जीत मिलती रहेगी और यदि प्रत्याशी थोड़ा भी संसाधनों के लिहाज से कमजोर होंगे तो हार होती रहेगी। इसीलिए दोनों शहरों में मजबूत संगठन की आवश्यकता है। ऐसे संगठन की जो कि कमजोर प्रत्याशी को भी जीत तक पहुंचा सके। संगठन में ऐसे पदाधिकारी और सदस्य न हो जो कि व्यक्ति विशेष व्यक्ति विशेष से जुड़ाव रखते हो। उनका पूरा लगाव और निष्ठा पार्टी के प्रति होनी चाहिए।